ढाक के तीन पात
ढाक एक पेड़ का नाम होता है और ढाक के तीन पात का मतलब बहुत कम पत्तों के पेड़ के लिए होता है। बिना पत्तों का पेड़ किसी काम का नही होता। वह छाया नहीं दे सकता।
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“ढाक के तीन पात, ” इस मुहावरे का प्रयोग ऐसी स्थिति को बयां करने के लिए किया जाता है जहां हम शून्य बदलाव देखते हैं या साधारण भाषा में कहें तो ‘एक समान रहना’ यह इसका अर्थ है।
इसका वाक्य में इस प्रकार प्रयोग किया जाता है -
- हिंदुस्तान में कई सरकारें आईं और गईं पर स्थिति वही ढाक के तीन पात।
- इस लड़के के सभी साथी कहां-कहां पहुंच गए हैं, पर यह वही है ढाक के तीन पात।
जहां तक इसकी उत्पत्ति की बात है, यह शायद इसलिए हुई क्योंकि ढाक के पात यानी पत्ते एक साथ तीन के समूह में होते हैं। ढाक को ‘पलाश’और ‘टेसू’ नाम से भी जाना जाता है। इस वृक्ष की विकास दर भी धीमी होती है, शायद इन्हीं कारणों से यह मुहावरा प्रयोग किया जाता है।
अन्य जानकारी : ढाक वृक्ष एक औषधीय वृक्ष भी है, इसके पांच भागों (जड़, तना, फल, फूल और बीज) से औषधि बनाई जाती है , इसमें बहुत सुंदर पुष्प आते हैं, साथ ही इसके पत्ते आकार में बड़े होने के कारण पत्तल बनाने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं।
“ढाक के तीन पात” जैसा कि यह कहावत है; इसका मतलब है:-
- हमेशा एक जैसी दशा में रहना।
- एक जैसी स्थिति जिसमें कोई बदलाव नहीं होना।
पहले मैं इस वाक्य का मतलब स्पष्ट करती हूँ। ढाक या पलाश एक वृक्ष होता है, जो उत्तर भारत के गाँवों में पाया जाता है। अब जंगलों के कटने के कारण इसकी संख्या ना के बराबर हो गयी है। पलाश के फूल लाल रंग के खूबसूरत फूल होते हैं, जिससे प्राकृतिक लाल रंग बनाया जाता है ।
ढाक के तीन पात कहावत में इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि ढाक के पेड़ के ही पत्ते सिर्फ “तीन की संख्या” में होते हैं । किसी भी टहनी पर न चार पत्ते होते हैं और न ही दो।
अब यह कहावत कैसे बनी “ढाक के तीन पात” मैंं यह बताना चाहूँगी। जब भी ढाक के पेड़ में पत्ते उगते थे, तो गहरे हरे रंग के होते थे। यह छतरी के आकार में बढ़ते थे ;जो शीतल वृक्ष कहलाते थे।
लेकिन जब भी पेड़ पर फूल उगने का मौसम आता था तो उस समय सारे पत्ते घरती पर गिर जाते थे। हर मौसम में ऐसा ही होता था। जब भी पलाश के फूल खिलते थे ,पत्ते वृक्ष को शीतलता प्रदान करने की जगह हमेशा धरती पर गिर जाते थे ।
इसी प्रक्रिया के कारण यह कहावत बनी कि जब भी ढाक के फूलों के खिलने का मौसम आता था इसके तीन पत्ते कभी अपने महत्व यानी शीतलता को बनाए रखने के लिए पेड़ पर नहीं रह पाए। प्रकृति की यही नियति थी और सदा यही नियति बनी रही। ऊपर के चित्रों मे खिले हुए फूल जिसमें पत्ते नहीं हैं, और तीन पात या पत्तियों को देख सकते हैं।
इस प्रकार यह कहावत बनी कि” ढाक के तीन पात”। जिसका मतलब ढाक के पत्ते की दशा हमेशा दयनीय बनी रही। धरती पर गिरने के बाद भी ये तीन की संख्या में एक साथ रहे। पत्ते कभी भी एक दूसरे से अलग नहीं हुए। इनकी स्थिति सदा एक जैसी बनी रही। अर्थात ढाक के पत्तों की दशा में कोई बदलाव नहीं आया चाहे यह पेड़ पर लगे हों या धरती पर गिरे हों। इसी कारण से यह मुहावरा बन गया।“ ढाक के तीन पात” ।
मुहावरे का प्रयोग वाक्य में इस प्रकार करते हैं।
- रमेश ने पढ़ाई करने के बाद नौकरी में तरक्की पाने के लिए बहुत मेहनत की लेकिन उसकी स्थिति हमेशा “ढाक के तीन पात”ही रही।
- जब तक मेहनत से कोई काम नहीं किया जाता, नतीजा “ ढाक के तीन पात” ही होता है।
- मैने अपने ड्राईवर के बेटे को पढ़ाने की बहुत कोशिश की लेकिन उसकी रूचि नहीं रहने के कारण नतीजा” ढाक के तीन पात”निकला।
मैने अपने उत्तर में इस मुहावरे का अर्थ और उसकी उत्पति के बारे में बताया है जिससे इसका मतलब स्पष्ट हो गया होगा।
मुझसे इस प्रश्न पूछने के लिए धन्यवाद अश्विनी जी।
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